The Great Comfort

July 13th, 2010

More than 300 people are killed in road accidents every day in our country. As per a UN study accidents causing 80% of these deaths involve violation of traffic rules.

Violation of traffic rules no longer leaves an accident, an accident. In true sense, more than 240 people are deliberately killed every day by assaulting them with mechanized metallic bodies. Most of these deaths happen to be in metro Cities, where the masses are most educated & enlightened and the administration is most efficient & honest.

The intellectuals I run in to prima facie reject this issue as a non-issue. They are also violently averse to the idea of discussing unhealthy economic growth, rising crime & corruption, and the falling social structure in Indian society. They rather prefer to talk about human rights violations in China or diktats of Khap panchayat in Indian Villages. For these two issues provide them a wide horizon to demonstrate their profound knowledge.

It is very comforting for me to find such self-centered people around. For it gives me space & time for staying centered around myself.

इस पार, उस पार

June 19th, 2010

Another great one from big B:

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरालहरा यह शाखाएँ
कुछ शोक भुला देती मन का,
कल मुर्झानेवाली कलियाँ
हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती,
रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी
नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती,
मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं
यह वायु उड़ा ले जाती है;
ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,
ये साधन भी छिन जाएँगे;
तब मानव की चेतनता का
आधार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पाएँगे,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है,
असमर्थबना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है,
हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता
है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं, कहकर ही
कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का
अधिकार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

कुछ भी न किया था जब उसका,
उसने पथ में काँटे बोये,
वे भार दिए धर कंधों पर,
जो रो-रोकर हमने ढोए;
महलों के सपनों के भीतर
जर्जर खँडहर का सत्य भरा,
उर में ऐसी हलचल भर दी,
दो रात न हम सुख से सोए;
अब तो हम अपने जीवन भर
उस क्रूर कठिन को कोस चुके;
उस पार नियति का मानव से
व्यवहार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

संसृति के जीवन में, सुभगे
ऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,
जब दिनकर की तमहर किरणे
तम के अन्दर छिप जाएँगी,
जब निज प्रियतम का शव, रजनी
तम की चादर से ढक देगी,
तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वी
कितने दिन खैर मनाएगी!
जब इस लंबे-चौड़े जग का
अस्तित्व न रहने पाएगा,
तब हम दोनो का नन्हा-सा
संसार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

ऐसा चिर पतझड़ आएगा
कोयल न कुहुक फिर पाएगी,
बुलबुल न अंधेरे में गागा
जीवन की ज्योति जगाएगी,
अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर
‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,
अलि-अवली कलि-दल पर गुंजन
करने के हेतु न आएगी,
जब इतनी रसमय ध्वनियों का
अवसान, प्रिये, हो जाएगा,
तब शुष्क हमारे कंठों का
उद्गार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जन
निर्झरिणी भूलेगी नर्तन,
निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,
सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,
वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,
चुप हो छिप जाना चाहेगा,
मुँह खोल खड़े रह जाएँगे
गंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;
संगीत सजीव हुआ जिनमें,
जब मौन वही हो जाएँगे,
तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री का
जड़ तार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

उतरे इन आखों के आगे
जो हार चमेली ने पहने,
वह छीन रहा, देखो, माली,
सुकुमार लताओं के गहने,
दो दिन में खींची जाएगी
ऊषा की साड़ी सिन्दूरी,
पट इन्द्रधनुष का सतरंगा
पाएगा कितने दिन रहने;
जब मूर्तिमती सत्ताओं की
शोभा-सुषमा लुट जाएगी,
तब कवि के कल्पित स्वप्नों का
श्रृंगार न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

दृग देख जहाँ तक पाते हैं,
तम का सागर लहराता है,
फिर भी उस पार खड़ा कोई
हम सब को खींच बुलाता है;
मैं आज चला तुम आओगी
कल, परसों सब संगीसाथी,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है;
मेरा तो होता मन डगडग,
तट पर ही के हलकोरों से!
जब मैं एकाकी पहुँचूँगा
मँझधार, न जाने क्या होगा!
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,
उस पार न जाने क्या होगा!

- Harivansh Rai Bachchan

क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?

June 19th, 2010

क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

मैं दुखी जब जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं क्र्ताज्न्य हुआ हमेशा,
रीती दोनों ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है भोज भरी;
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

यह भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरों से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का व्यापार जारी?
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

क्यों ना हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुःख नहीं बनते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना है जो दिखाता
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करुँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करुँ?

- Big B (Harivansh Rai Bachchan)

India Shinning

June 8th, 2010

Every high profile gets out from the CBI’s hands because that is the wish of the government. The CBI is a highly skilled agency but it is not allowed to work against people in high places. I was moved out of the CBI because I insisted on following people in high places.
- B R Lall,  former Central Bureau of Investigation (CBI) officer

Vibrant Gujarat & Shinning India

June 5th, 2010

A detailed report on chemical pollution in Gujarat:

http://www.dailymail.co.uk/home/moslive/article-1188937/The-great-carbon-credit-eco-companies-causing-pollution.html

This article reveals how third world countries are becoming  a paradise for the polluting industries. The administrative & political corruption in these parts of the world has made the common man a victim of industrialization.

On Indian Media

June 3rd, 2010

Earlier, politicians had to pay for good coverage. Now, they have to pay to ensure that they do not get bad coverage. Good coverage is extra fees. - Arundhati Roy

What is Freedom?

May 18th, 2010

As France contemplates imposing a ban on Burqa (a veil worn by Muslim women), I am wondering if this ban would be pro-freedom or anti-freedom? Forcing a women to wear a burqa against her wish is a curb of Freedom, and so is forcing her to take off the Burqa against her wish.

Learning French Online

March 20th, 2010

Here are some audio/video tutorials and other useful material

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http://www.bbc.co.uk/languages/french/

http://www.frenchspanishonline.com/

http://ielanguages.com/french.html

http://french.about.com/

http://www.bonjour.com/

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कविता - कुछ टुकडे

February 3rd, 2010

एक सही कविता
पहले
एक सार्थक वक्तव्य होती है।

कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।

कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।

कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

आखिर मैं क्या करूँ
आप ही जवाब दो?
तितली के पंखों में
पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में
कौन सा गुल खिला दूँ
जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा
हाशिये पर चुटकुला बन रहा है
क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर
निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दँ?

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- सुदामा पाण्डेय धुमिल

कुछ सूचनाएँ

February 3rd, 2010

सबसे अधिक हत्याएँ

समन्वयवादियों ने की।

दार्शनिकों ने

सबसे अधिक ज़ेवर खरीदा।

भीड़ ने कल बहुत पीटा

उस आदमी को

जिस का मुख ईसा से मिलता था।
वह कोई और महीना था।

जब प्रत्येक टहनी पर फूल खिलता था,

किंतु इस बार तो

मौसम बिना बरसे ही चला गया

न कहीं घटा घिरी

न बूँद गिरी

फिर भी लोगों में टी.बी. के कीटाणु

कई प्रतिशत बढ़ गए
कई बौखलाए हुए मेंढक

कुएँ की काई लगी दीवाल पर

चढ़ गए,

और सूरज को धिक्कारने लगे

–व्यर्थ ही प्रकाश की बड़ाई में बकता है

सूरज कितना मजबूर है

कि हर चीज़ पर एक सा चमकता है।
हवा बुदबुदाती है

बात कई पर्तों से आती है—

एक बहुत बारीक पीला कीड़ा

आकाश छू रहा था,

और युवक मीठे जुलाब की गोलियाँ खा कर

शौचालयों के सामने

पँक्तिबद्ध खड़े हैं।
आँखों में ज्योति के बच्चे मर गए हैं

लोग खोई हुई आवाज़ों में

एक दूसरे की सेहत पूछते हैं

और बेहद डर गए हैं।
सब के सब

रोशनी की आँच से

कुछ ऐसे बचते हैं

कि सूरज को पानी से

रचते हैं।
बुद्ध की आँख से खून चू रहा था

नगर के मुख्य चौरस्ते पर

शोकप्रस्ताव पारित हुए,

हिजड़ो ने भाषण दिए

लिंग-बोध पर,

वेश्याओं ने कविताएँ पढ़ीं

आत्म-शोध पर

प्रेम में असफल छात्राएँ

अध्यापिकाएँ बन गई हैं

और रिटायर्ड बूढ़े

सर्वोदयी-

आदमी की सबसे अच्छी नस्ल

युद्धों में नष्ट हो गई,

देश का सबसे अच्छा स्वास्थ्य

विद्यालयों में

संक्रामक रोगों से ग्रस्त है
(मैंने राष्ट्र के कर्णधारों को

सड़को पर

किश्तियों की खोज में

भटकते हुए देखा है)
संघर्ष की मुद्रा में घायल पुरुषार्थ

भीतर ही भीतर

एक निःशब्द विस्फोट से त्रस्त है
पिकनिक से लौटी हुई लड़कियाँ

प्रेम-गीतों से गरारे करती हैं

सबसे अच्छे मस्तिष्क,

आरामकुर्सी पर

चित्त पड़े हैं।

———————

- सुदामा पाण्डेय धुमिल